प्रेम शुक्ल
पाकिस्तान इस समय राजनीतिक बदहाली के दौर से गुजर रहा है, उसकी इस राजनीतिक बदहाली के मूल में उसकी आर्थिक बदहाली है। दुनिया इस तथ्य से भली-भांति अवगत है कि पाकिस्तान का सत्ता केंद्र निर्वाचित सरकारों की बजाए पाकिस्तानी सेना के हाथ में रहता है। बीते 75 वर्षों में अधिकांश कालखंड सेना ने प्रत्यक्ष रूप से हुकूमत को नियंत्रित किया है। जब सत्ता राजनीतिक दलों के हाथ में रही है तब भी सत्ता का अपरोक्ष केंद्र सेना ही रही है। इसीलिए जब 2018 में इमरान खान नियाजी ने सत्ता का सूत्र संभाला तो हर किसी को लगा कि सेना की कठपुतली होने के कारण संभव है इमरान अपना कार्यकाल पूरा कर लें। चूंकि सेना ने इमरान खान को सत्ता में संस्थापित करने के लिए स्वयं चुनाव को प्रभावित किया था ऐसे में वह सेना के कोप के शिकार नहीं बनेंगे।
इमरान खान 4 वर्षों का कार्यकाल बमुश्किल पूरा कर पाए थे कि उनके खिलाफ जबरदस्त विरोध के स्वर मुखर हो गए। खुद सेना की आंखों में भी इमरान खान किरकिरी बन कर चुभने लगे। सेना को अनुमान था कि राजनीतिक एवं प्रशासनिक अनुभव हीनता के कारण इमरान खान नियाजी उनके इशारों पर नाचेंगे। सेना का मानना था कि अमेरिका, सऊदी अरब और चीन के साथ पाकिस्तान के संबंधों में भी इमरान खान के कार्यकाल में सुधार होगा। इमरान खान पाकिस्तान के तीनों प्रायोजकों को खुश रखने में समर्थ रहेंगे। हुआ उल्टा। इमरान खान नियाजी के कार्यकाल में अमेरिका के साथ पाकिस्तान के संबंध सबसे निचले पायदान पर पहुंच गए। चीन ने एक बार पाकिस्तान को आर्थिक संकट से उबारने का वादा तो किया, पर उसका अनुपालन करने से वह पीछे हट गया।
सऊदी अरब ने पाकिस्तान की मदद तो की पर कड़ी शर्तों को लादकर उसने संकेत दे दिया अब खैरात के दिन लद चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय साख घटने के साथ-साथ जिस तरह से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का दिवाला पिटा उससे उपजी स्थितियों का ठीकरा पाकिस्तान की सेना अपने सिर पर क्यों फूटने दे? सेना ने जिस तरह से इमरान खान नियाजी के समर्थन में बढ़े अपने हाथों को खींचा उसने ही पाकिस्तान की विपक्ष हो इमरान खान के खिलाफ मनोबल प्रदान कर दिया। इमरान खान के खिलाफ खड़े राजनीतिक असंतोष की आर्थिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।
यूरोप के कई पाकिस्तानी दूतावासों में बीते कई महीनों से अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन का भुगतान नहीं हुआ है। बेलग्रेड स्थित दूतावास के आधिकारिक हैंडल से वेतन के भुगतान ना होने के बारे में बाकायदा ट्वीट प्रसारित हुआ। हालांकि हैकिंग का मामला बताकर पाकिस्तानी दूतावास ने इसे रफा-दफा करने का प्रयास किया, लेकिन यह सत्य है कि पाकिस्तानी दूतावास की कई सारे कर्मचारियों की संतानें अपने शिक्षा संस्थानों में फीस भरने में भी विफल रही हैं। इसके कारण उनके परिजनों को नोटिस जारी हो चुका है। जब 2018 में इमरान खान ने प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली थी, तब पाकिस्तान की आर्थिक वृद्धि दर 5.8 फीसदी थी। हुक्मरानों को अपेक्षा थी कि इमरान खान के नेतृत्व में अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी। हुआ उल्टा 2019 में पाकिस्तान की आर्थिक वृद्धि दर गिरकर 0.99 फीसदी रह गई. अगले वर्ष 2020 में और नीचे गिर कर 0.53 फीसदी हो गई।
परिणाम स्वरूप चालू वित्त वर्ष का घाटा बड़े पैमाने पर बढ़ गया .बदहाल अर्थव्यवस्था में पाकिस्तानी रुपए का मूल्य औंधे मुंह धराशाई हो गया। विदेशी ऋण की वापसी का बोझ भी सतत बढ़ता चला गया। पाकिस्तान की घरेलू आवश्यकताएं बड़े पैमाने पर आयात पर ही निर्भर हैं। सो भुगतान का संतुलन भी बिगड़ गया। 2019 में इमरान खान इस संकट से उबरने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पास गए। पिछले चार दशकों में आईएमएफ पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को 13 बार उबार चुका है। ऐसे में इमरान खान को आशा थी की 14वीं बार भी आईएमएफ उनका तारणहार बन जाएगा। इमरान खान आईएमएफ से 6 बिलियन डॉलर आर्थिक पैकेज चाहते थे, लेकिन आईएमएफए 6 बिलियन डॉलर कर्ज के बदले पाकिस्तान में ढांचागत सुधार और सरकारी ऋण घटाने की शर्त सामने रख दी। इमरान खान चीन के सामने भी गए, कई दौरों की वार्ता भी हुई पर चीन भी उन्हें आर्थिक संकट से मुफ्त में उबारने के लिए तैयार नहीं हुआ। 27 नवंबर 2021 को सऊदी अरब में पाकिस्तान को 3 बिलियन डॉलर के कर्ज की मंजूरी दी। यह मंजूरी मोटे ब्याज दर और कड़ी शर्तों के साथ मिली।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के वित्तीय सलाहकार मुजम्मिल असलम ने सऊदी अरब से मिले कर्ज की मंजूरी प्राप्त होते ही बयान दिया कि पाकिस्तान को 60 दिनों के भीतर 7 बिलियन डॉलर सहायता की उम्मीद है। इस राशि में सऊदी अरब का 3 बिलियन डॉलर की डिपाजिट राशि, 1.2 बिलियन डॉलर मूल्य की सऊदी तेल की आपूर्ति, जिसका भुगतान विलंबित रहेगा और 800 मिलीयन डॉलर मूल्य का इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक की तेल आपूर्ति सुविधा शामिल है। जो सऊदी अरब किसी जमाने में पाकिस्तान को दिए जाने वाले अधिकांश कर्ज को अनुदान में परिवर्तित कर दिया करता था, वही अब उसी पाकिस्तान को 3 बिलियन डॉलर का कर्ज़ 4 फ़ीसदी ब्याज के भुगतान पर देता है। इस कर्ज के खिलाफ पाकिस्तान को किसी प्रकार की विधिक कार्यवाही का भी अधिकार प्राप्त नहीं है। कर्ज के जाल में पाकिस्तान उलझा ही है, पाकिस्तान में खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति की दर भी बेतहाशा गगनचुंबी हो गई।
2020 के मई माह मुद्रास्फीति दर 23.6 फ़ीसदी पहुंच गई थी। आज भी पाकिस्तान में खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति दहाई के आंकड़े को पार किए पड़ी है। दूध, मछली, मुर्गे जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ आम आदमी की थाली से बाहर हो चुके हैं। कोविड महामारी के कारण पाकिस्तान में लगभग 10000 फैक्ट्रियां बंद पड़ चुकी हैं, जिसके कारण लगभग दो करोड़ लोग बेरोजगार हो गए। अमेरिकी रूखेपन और पाकिस्तान के अंदरूनी हालात के चलते कोई विदेशी संस्थागत निवेशक पाकिस्तान में निवेश के लिए तैयार नहीं है। चीनी ड्रैगन निवेश और कर्ज के जाल के माध्यम से पाकिस्तान को अपने चंगुल में ले चुका है। चाइना-पाकिस्तान इकोनामिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का निवेश 46 बिलियन डालर से बढ़कर 65 बिलियन बिलियन डालर तक हो चुका है। आतंकी हमलों से चीनी निवेश की परियोजनाओं को संरक्षित कर पाने में पाकिस्तानी प्रशासन विफल रहा है। चीन का कर्ज पाकिस्तान के सिर पर लगातार बढ़ता चला गया। आईएमएफ के आंकड़ों के अनुसार 2013 में पाकिस्तान पर कुल विदेशी कर्ज 44.35 बिलियन डॉलर का हुआ करता था जिसमें चीनी कर्ज की हिस्सेदारी सिर्फ 9.3 फीसदी हुआ करती थी। पिछले वित्तीय वर्ष में यह कर्ज दोगुना हो चुका है।
अब पाकिस्तान पर 90.12 बिलियन डॉलर का कर्ज है। इस कर्ज में चीन की हिस्सेदारी 27.4 फीसदी यानी लगभग 24.7 बिलियन डॉलर हो चुका है। बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध के संसाधनों को जिस अंदाज में चीनी कंपनियां कब्जा कर रही हैं उससे पाकिस्तानी आवाम में भयंकर बेचैनी है। इमरान खान की इन विफलताओं को पाकिस्तानी सेना अपने इमेज के लिए खतरा पाती है। इसलिए उसने इमरान खान से किनारा करना प्रारंभ कर लिया। जब आईएसआई के मुखिया फैज हामिद को हटाकर सेना प्रमुख कमर बाजवा ने नदीम अंजुम को लाने का फैसला किया तो इमरान खान ने इसका विरोध किया। 2018 में फैज हामिद ने इमरान खान को सरकार में लाने में अहम भूमिका अदा की थी. सो इमरान खान उनका कर्ज उतारना चाहते थे। किंतु सेना के सामने इमरान खान की नहीं चली। भले ही कमर बाजवा आईएसआई प्रमुख की नियुक्ति में अपनी चला ले गए, किंतु अपनी ही बिल्ली के म्याऊं करने के स्वभाव ने उन्हें आहत किया। सनद रहे कि नवाज शरीफ का परिवार पाकिस्तानी सेना के साथ समन्वय बनाकर चलने में सिद्धहस्त है। उसमें भी पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री के रूप में शाहबाज शरीफ हमेशा सेना के अनुकूल काम करते आए हैं।
सऊदी अरब से भी शरीफ परिवार के संबंध पाकिस्तान के अन्य राजनीतिज्ञों की तुलना में बेहतर हैं। चीनी कंपनियों के लिए भी शरीफ के शासनकाल में लाल गलीचा बिछाया गया था। भले ही इमरान खान अपने खिलाफ खड़े हुए राजनीतिक विद्रोह को अमेरिका प्रायोजित बता रहे हों और खुद को चीन के पक्षधर साबित करने के प्रयास में जुटे हों, पर सत्य यह है की चीन, सेना और सऊदी इस त्रिकोण में शरीफ परिवार इमरान से कहीं ज्यादा प्रभावशाली है। जब इमरान खान के कार्यकाल में अमेरिका नाराज हो, सऊदी अपनी शर्तें लाद रहा हो, आईएमएफ पाकिस्तान के कर्ज के पैकेज को अक्सर नामंजूर कर रहा हो तब पाकिस्तान की सेना इमरान खान के बोझ को अपने कंधे पर क्यों ढोए? वास्तव में पाकिस्तान के हालात भी श्रीलंका जैसे हैं। अब उसे बचाने में इस्लामी उम्मा की रुचि भी शेष नहीं है। ना ही अमेरिका पाकिस्तान को अपना रणनीतिक साझेदार मानता है। सऊदी, पाकिस्तान पर खैरात लुटाने के लिए राजी नहीं। चीन खैरात की राजनीति में विश्वास नहीं रखता। ऐसे में इमरान खान का आना- जाना उतनी बड़ी बात नहीं, जितना इस संकेत से पाकिस्तान को खतरा है। आने वाले दिनों में क्या पाकिस्तान अपना अस्तित्व बचा पाएगा ? इमरान खान की सत्ता अल्पायु है… क्या पाकिस्तान दीर्घायु हो पाएगा! यह बड़ा सवाल है।